Saturday, September 12, 2009

अन्ताराष्ट्रीय भाषा - संस्कृत (International Langauge - Sanskrit)

अन्ताराष्ट्रीय भाषा संस्कृत

( लेखक : श्री लक्ष्मीनारायण गुप्त )

भाषासु मुख्यामधुरा दिव्या गीर्वाण भारती।

तस्माद्धि मधुरं काव्यं तस्मादपि सुभाषितम् ॥

भावार्थ - सब भाषाओं में मुख्य, मीठी और दैवी संस्कृत भाषा है। उसमें भी काव्य बहुत ही मीठा है एवं उससे भी अधिक मीठा, प्रभावशाली नैतिक शिक्षा देने वाला सुभाषित है अर्थात् अच्छी शिक्षा देने वाली उक्ति है।

भारत की सारी भाषाएँ तो संस्कृत से ही निकलीं हैं किन्तु संस्कृत का प्रभाव केवल भारत में ही नहीं विदेशी भाषाओं पर भी पड़ा है। फारसी, लेटिन, अङ्ग्रेजी और श्रीलङ्का की भाषा, नेपाली एवं अफ्रीका के मूल निवासियों की भाषा पर संस्कृत का प्रभाव है। पश्चिमी अमेरिका राज्य में एक जाति ऐसी है जो संस्कृत से मिलती-जुलती भाषा से अपने विवाह संस्कार करती है और वैसे ही भाषा बोलती है। इंडोनेशिया, मलेशिया एवं सिंगापुर की भाषाओं पर भी संस्कृत का प्रभाव है। महर्षि महेश योगी के द्वारा विदेशों में संस्कृत का बहुत अधिक प्रचार किया गया। साथ ही हरे कृष्ण मिशन द्वारा भी विदेशों में संस्कृत का गीता के माध्यम से प्रचार किया गया। महर्षि अरविन्द ने विश्व संस्कृत प्रतिष्ठान की स्थापना पाण्डिचेरी में की थी। उसमें उनकी शिष्या फ्रांसीसी महिला ने फ्रांस तथा अन्य देशों में भी संस्कृत का प्रचार किया। महर्षि अरविन्द और उनकी शिष्या के ब्रह्मलीन हो जाने पर काशी के राजा श्री विभूतिनारायण सिंह विश्व संस्कृत प्रतिष्ठान के अध्यक्ष हुये एवं उपाध्यक्ष श्री गुलाम दस्तगीर बनाये गये। गुलाम दस्तगीर मुसलमान होते हुये भी संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित हैं। वे सब जगह सरल संस्कृत भाषा में ही बोलते हैं। भारत में ऐसे कई परिवार हैं जिन्होंने अपनी मातृभाषा संस्कृत लिखवायी है एवं वे घर में संस्कृत में ही बोलते हैं। पी. सी. रेन की इंग्लिश ग्रामर में एक वाक्य लिखा है कालिदास इज़ शेक्सपियर ऑफ़ इंडियाकिंतु जब विदेशी विद्वानों गेटे तथा अन्य लोगों ने संस्कृत का अध्ययन कर कालिदास के काव्यों को पढ़ा तब वे आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने घोषित किया कि कालिदास इज़ दी ग्रेटेस्ट पॉयट ऑफ़ इंडिया, इन दी सिमिली ऑफ़ कालिदास शेक्सपियर इज़ नथिङ्ग। शेक्सपियर इज़ ऑन्ली ए ड्रेमेटिस्ट एण्ड कालिदास इज़ दी ग्रेटेस्ट पॉयट ऑफ़ दी वर्ल्ड जब विदेशी लोगों ने कालिदास को संसार के सर्वश्रेष्ठ कवि की मान्यता दी तब हम मूर्खों की आँखें खुली और हम भारतीयों ने कालिदास जयन्ती मनाना प्रारंभ किया। तब हमारी सरकार की भी आँखें खुली और शासकीय स्तर पर कालिदास जयन्ती प्रथम बार मनायी गयी। इस अवसर पर सारे विदेशी राजदूतों को एवं विद्वानों को भी आमन्त्रित किया गया था। कालिदास जयन्ती पर शासकीय मन्त्रियों एवं अधिकारियों ने अङ्ग्रेजी में भाषण दिया किन्तु तत्कालीन अफ़गानिस्तान के राजदूत ने धाराप्रवाह संस्कृत में भाषण दिया। सब लोग आश्चर्यचकित हो गए। कुछ तथाकथित पन्थ निरपेक्षों ने उनसे पूछा तुम मुसलमान होते हुये भी इतनी अच्छी संस्कृत बोलते हो तब उन्होंने उत्तर दिया यहाँ हिन्दु-मुसलमान का क्या प्रश्न है। हमारे अफ़गानिस्तान की भाषा पश्तो है जो संस्कृत से निकली है। हमें पश्तो की व्याकरण जानने के लिये संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। हमारे यहाँ लगभग २५-३० वर्षों से संस्कृत अनिवार्य भाषा है। इसी संदर्भ में हिटलर ने द्वितीय महायुद्ध के बहुत पहले ही जर्मनी में संस्कृत भाषा अनिवार्य कर दी थी। उसने कहा - जर्मन शब्द शर्मन् शब्द का अपभ्रंश है। हम लोग ब्राह्मण हैं, आर्य हैं। उसने अपने ध्वज पर स्वस्तिक लगाया। उसी प्रकार वहाँ बड़ा विश्वविद्यालय है और वहाँ के रेडियो पर बहुत कुछ संस्कृत में प्रसारण होता था। अभी भी वहाँ से प्रसारण होता है। स्वतन्त्र होने के बाद हमारे यहाँ जर्मनी में एक राजदूत नियुक्त किया गया। वह अपने लड़के को उस संस्कृत विश्वविद्यालय में भर्ती कराने के लिये ले गया। यह राजदूत महाशय उनसे अङ्ग्रेजी में बोलते थे और वहाँ के अधिकारी संस्कृत में बोलते थे। दुभाषिया एक दूसरे को समझाता था। जब सब बातें हो चुकीं और राजदूत महोदय जब लौटने लगे तो वहाँ के अधिकारी ने संस्कृत में कहा - गच्छतु आर्यः पुनरागमनाय ये महाशय लौट करके पूछने लगे यह आप कौन सी भाषा बोलते हो, यह आपकी भाषा तो मालूम नहीं पड़ती ? तब उन्होंने उत्तर दिया हम आपकी ही स्वयं की संस्कृत में बोल रहे हैं, आप को इसका पता नहीं चला। तब राजदूत महाशय कहने लगे क्या संस्कृत में बोला भी जा सकता है ? हम तो समझते थे भागवत, सत्यनारायण कथा ही होती है। तब वहाँ के अधिकारियों को हँसी आई और उन्होंने कहा - आप भौतिक रूप से स्वतन्त्र हुये है किन्तु अभी भी आप मानसिक रूप से पूर्णरूप से अंग्रेजों के दास है।

लॉर्ड मेकॉले ने जब कलकत्ता में एक विद्यालय की स्थापना की तब उसने भारत के सभी भाषा विद्वानों को आमन्त्रित किया एवं उनसे पूछा कि आप लोगों को शिक्षा किस भाषा में दी जाना चाहिये। तब सब विद्वानों ने एकमत से कहा - संस्कृत भाषा में दी जाना चाहिये। परंतु लॉर्ड मेकॉले ने कहा - संस्कृत तो मृत भाषा है उसमें शिक्षा नही दी जा सकती। आप को उन्नति के शिखर पर पहुँचना है तो अङ्ग्रेजी भाषा में शिक्षा ग्रहण करो। आपको ऊँचें पद और नौकरियाँ मिलेगी। इस प्रकार लॉर्ड मेकॉले ने अपनी शिक्षा पद्धति भारतीयों को मानसिक रूप से पूर्ण दास बनाने के लिये प्रारम्भ की और उसी का अनुसरण हमारी सत्ता में बैठे हुए अङ्ग्रेजों के मानसिक दास अभी भी कर रहे हैं।

भारत में बड़े-बड़े गुरुकुल चलते थे जिसमें गुरु निशुल्क शिक्षा देते थे। वहाँ विद्यार्थियों को सब प्रकार की शिक्षा दी जाती थी। कोई बड़े-बड़े भवन नहीं थे, पर्णकुटियों में गुरु और शिष्य आश्रम बनाकर रहते थे। वेदों और वेदाङ्गों की वैज्ञानिक शिक्षा दी जाती थी। विद्यार्थियों को खेत में काम करना पड़ता था, पशु चराने के लिये जाना पड़ता था, जङ्गलों से लकड़ियाँ काटकर लाना पड़ता था, यज्ञ कुण्डों की लीपा-पोती करनी पड़ती थी। स्वयं कृष्ण सान्दिपनि ऋषि के यहाँ पढ़ते समय लकड़ी काटकर बरसते पानी में जङ्गल में रात होने पर वहीं भूखे सो जाते थे एवं गट्ठा सिर पर रखकर लाते थे। राम-लक्ष्मण विश्वामित्र मुनि के यहाँ उनकी पूर्ण सेवा करते हुए सारे नित्य कर्मों से निवृत्त होकर यज्ञ की रक्षा के लिये धनुष-बाण लेकर खड़े हो जाते थे एवं दुष्ट दानवों को नाश करते थे। गुरुकुलों में साहित्य की सारी विधाओं की शिक्षा दी जाती थी। उन्हें समाज से भिक्षा माँगकर भी लाना पड़ता था और गुरुमाता को देना पड़ता था। गुरुमाता उन्हें भोजन बनाकर देती थी। भिक्षा माँगकर लाने का तात्पर्य यह था कि जनता अपना कर्तव्य समझकर विद्यार्थियों को भिक्षा देती है तो विद्यार्थियों का भी कर्तव्य है कि जिस विद्या में वह प्रवीण हुए हैं उस विद्या का लाभ जनता को अपना कर्तव्य समझकर निशुल्क दें और ऐसे नैतिक लोग तैयार होते थे जो अपना कर्तव्य समझकर प्रजा की भलाई में लगते थे। तभी भारत में राम राज्य था, सत् युग था। इसी प्रकार गुरुकुलों ने विशाल रूप धारण कर लिया। तक्षशिला एवं नालन्दा सभी विधाओं के विश्वविद्यालय थे। तक्षशिला विश्वविद्यालय में चाणक्य ने शिक्षा ग्रहण की एवं पश्चात् एक साधारण से बालक चन्द्रगुप्त को तक्षशिला में राजनीति एवं धर्म में निपुण करते हुये भारत का सम्राट बनवा दिया और नालन्दा में बहुत बड़ा विश्वविद्यालय बना दिया। मैं स्वयं उसको देख कर आया हूँ। किन्तु संस्कृत की इस उक्ति के अनुसार शस्त्ररक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचिन्ता कर्तव्या इसकी हमने आगे चलकर उपेक्षा की। उसका परिणाम यह हुआ कि विदेशी आक्रमणकारियों ने हमारे दोनों विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया एवं वहाँ जो विचित्र विधाओं के ग्रन्थ थे उन्हें जलाकर आक्रामक सेना के सैनिकों ने गर्म पानी करके स्नान किया और उन्हीं को जलाकर भोजन भी बनाया। हमारी सारी विधाएँ नष्ट हो गईं। अङ्ग्रेजों ने भी काशी और पैठन के ग्रन्थों को नीलाम किया और वे भी जर्मनी और लन्दन के वाचनालयों में रखें हुए हैं। यह तो हमारे विद्वानों का कठोर परिश्रम था कि उन्होंने वेदों और अन्य ग्रन्थों को कण्ठस्थ कर लिया था। आज भी ऋग्वेदी, सामवेदी, यजुर्वेदी और अथर्ववेदी विद्वानों को यह वेद एवं अन्य शास्त्र कण्ठस्थ हैं। उन्हीं के कारण संस्कृत भाषा बची हुयी है।

एक संस्कृत का वाक्य है असन्तुष्टा द्विजानष्टा सन्तुष्टा वैपार्थिवाः। इस उक्ति के अनुसार हमारे विद्वान् असन्तोषी और अहङ्कारी हो गए हैं और हमारे क्षत्रिय लोग सन्तोषी हो गए हैं। इसी कारण हमारी संस्कृति, हमारी संस्कृत भाषा और हमारे देश की दुर्दशा हो रही है।

एक उदाहरण के अनुसार मैं अपना अनुभव बताता हूँ। मुझे काशी के राजा श्री विभूतिनारायण सिंह ने मध्यप्रदेश का संस्कृत का प्रचार मन्त्री नियुक्त किया था। उनके आदेशानुसार मध्यप्रदेश के कई नगरों में संस्कृत प्रचार समितियाँ गठित की गईं। भोपाल के एक प्रतिष्ठित संस्कृत के विद्वान् जो किसी संस्कृत विद्यालय के प्राचार्य अथवा कुलपति रह चुके होंगे उनसे मैंने समिति की अध्यक्षता करने के लिये कहा। उन्होंने मुझसे पूछा मध्यप्रदेश की समिति में कौन-कौन लोग हैं ? तो मैंने कुछ विद्वानों के नाम बताये तो वे कहने लगे कि ऐसे निकृष्ट लोगों के साथ में हम कैसे काम कर सकते हैं। मैंने उनसे कहा - हमें संस्कृत का प्रचार करना है तो निकृष्ट से निकृष्ट लोगों के साथ जाकर प्रचार करना पड़ेगा। परन्तु उनके अहङ्कार ने यह बात स्वीकृत नहीं की। मैंने राजा श्री भर्तृहरि का श्लोक सुना दिया।

यदा किञ्जिज्ञोऽहं द्विपमिव मदान्धः समभवम्।

तदा सर्वज्ञोऽस्मीति भवदवलिप्तं मे मनः ॥

यदा किञ्चित्किञ्चिद् बुधजनसकासादवगतम्।

तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वरमिव मदो मे व्यपगतः ॥

भावार्थ - जब मैं कुछ-कुछ जानता था तब मैं हाथी के समान मदमत्त हो गया। तब मैं सर्वज्ञ हूँ इस प्रकार मेरा मन गर्व से भर गया। जब कुछ-कुछ विद्वान् लोगों के पास से ज्ञान प्राप्त किया तब मैं मूर्ख हूँ इस प्रकार ज्वर के समान मेरा मद नष्ट हो गया।

आज निरभिमानी लोगों के द्वारा संस्कृत का प्रचार गुरुकुलों के माध्यम से किया जाना चाहिए तभी नैतिक, सदाचारी, कर्तव्यनिष्ठ, शूरवीर, देशभक्त निर्मित किये जा सकते हैं। ऐसी नवयुवक पीढ़ी के द्वारा ही भारत जगद्गुरु बन सकता है।